बीमा करते समय कंपनियां करती हैं हजारों वादे, क्लेम के समय पीड़ितों को मिलती हैं तारीख-पे-तारीख

हिसार :- बीमा कंपनियां वाहनों के इंश्योरेंस करते समय जितने वादे लाभार्थी को गिनवाते हैं, इससे दोगुने कारण क्लेम न देने के लिए गिनवाते हैं। यानि क्लेम देते समय बीमा कंपनियां निगेटिव रोल निभाती हैं। ये पूरी कोशिश करती है कि उन्हें क्लेम न देने पड़े। यही कारण है कि किसी सड़क हादसे में जान गंवाने या शरीर का कोई अंग गंवाने पर भी तीन से चार साल तक बीमा कंपनियों से क्लेम नहीं मिल पाता है, यहीं नहीं बीमा कंपनियों से क्लेम लेने के लिए जो फजीहत उठानी पड़ती है, उसका दर्द अलग है, यह फजीहत जले पर नमक छिड़कने के समान हो जाता है।

पुलिस रिपोर्ट पर बीमा कंपनियां नहीं देती क्लेम, कोर्ट या लोक अदालत में होते है अधिकतर फैसले

बीमा क्लेम पाने के लिए चार-चार सालों तक कभी अदालत तो कभी थानों के चक्कर लगाकर ही पीड़ित का काफी खर्चा हो जाता है। हालांकि साफ-सुथरे मामले में यानि किसी हादसे में स्थिति एकदम क्लीयर हो और क्लेम बनता भी है तो ऐसे मामलों में भी बीमा कंपनियां क्लेम देने में समय लगाती है। नियमों के अनुसार कम से कम एक महीने और अधिक से अधिक 90 दिन में क्लेम मिल जाना चाहिए, लेकिन बीमा कंपनियां कोर्ट में चक्कर कटवाने के बाद ही कोर्ट के आदेशों पर या लोक अदालत में फैसला होने पर ही क्लेम देती है। हिसार कोर्ट में पिछले पांच सालों में करीब 840 मामले लंबित है, हालांकि कोरोना काल के कारण भी कई मामले लंबित हैं।

हिसार कोर्ट में इतने मामले विचाराधीन

2018- 20

2019- 120

2020- 170

2021- 280

2022- 250

कुल – 840

पुलिस घटनास्थल पर जाकर करती है जांच

हादसे के बाद पुलिस घटनास्थल पर जाकर जांच करती है। पुलिस मौके से दुर्घटनाग्रस्त वाहनों के और घटनास्थल के फोटो लेती है और जांच करके पता लगाती है कि किसकी गलती है। शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज जाते हैं। मैकेनिक से गाड़ियों का मुआयना करवाया जाता है। स्पीड जांची जाती है। सीन को एक तरह से रिक्रिएट या कहे मौके पर मुआयना कर यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि गलती किसकी है। हालांकि कुछ मामलों में पुलिस की लापरवाही भी सामने आती है। अदालत मोटर क्लेम के लिए सबसे पहले पुलिस से एफआईआर रिपोर्ट मांगती है। इसमें हादसे से जुड़ी तमाम जानकारी होती है। इसके बाद आरोपित पक्ष और बीमा कंपनी को नोटिस जारी किया जाता है। इस दौरान बीमा कंपनी भी अपने स्तर पर जांच करवाती है।

पुलिस के लिए भी इन नियमों का पालन जरूरी

ट्रैफिक पुलिस के पास चालान बुक या फिर ई-चालान मशीन चालान करने के जरूरी है।
ट्रैफिक पुलिस का यूनिफार्म में होना जरूरी होता है।
इंडियन मोटर व्हीकल एक्ट 1932 के तहत एएसआइ स्तर का अधिकारी ही नियमों का उल्लंघन करने पर आपका चालान कर सकता है।
एएसआइ, एसआइ और इंस्पेक्टर को स्पाट पर फाइन करने का अधिकार होता है, जबकि ट्रैफिक कांस्टेबल सिर्फ इनकी मदद के लिए होते हैं।

यह बोले एक्सपर्ट

वरिष्ठ अधिवक्ता लाल बहादुर खोवाल ने बताया कि ऐसा कानून होना चाहिए कि यदि बीमा कंपनी क्लेम न करें तो संबंधित प्रशासन को बीमाकर्ता को क्लेम देना चाहिए। बिना बीमा कोई गाड़ी रोड पर चल रही है तो इसमें प्रशासन भी दोषी है, इसलिए इस कानून में संशोधन किया जाना चाहिए। यह प्रावधान होना चाहिए कि कोई गाड़ी बिना बीमा के रोड पर आई है तो उसके लिए प्रशासन की तरफ से ही क्लेम दिया जाए।

बीमा कंपनियां मेडिकल रिपोर्ट पर देती है क्लेम

बीमा कंपनियां आरसी, लाइसेंस आदि कहां से बने है और इनको वेरिफाई करती है। बीमा कंपनी के प्रतिनिधि मेडिकल बिल, मेडिकल रिपोर्ट आदि को चेक करती है। इनवेस्टीगेशन में लाइसेंस या नाबालिग न होने पर कंपनियां क्लेम नहीं देती।

यह बोले अधिवक्ता

अधिवक्ता योगेश सिहाग ने बताया कि बीमा कंपनियां मौत या अन्य मामलों में आयु और भविष्य की इनकम को देखते हुए क्लेम देती है। लेबर या डीसी रेट पर काम करने वाले और बिजनेसमैन की इनकम के हिसाब से क्लेम दिया जाता है। सड़क हादसों के मामलाें में अलग से जिला स्तर पर एक कोर्ट निर्धारित कर दी जानी चाहिए, ताकि ये मामले जल्द क्लीयर हो जाए। वहीं एक्सीडेंट से बचाव के लिए रोड पर रिफलेक्टर और डिवाइजर जरुर लगाए जाएं, अवैध कट हटा जाने चाहिए।

यह केस

डाबड़ा चौक के पास वर्ष 2016 में बोलेरो में सवार होकर चंडीगढ़ जा रहे मार्केटिंग बोर्ड के एसडीओ अशोक नैन के सिर पर स्ट्रीट लाइट का इंसुलेटर और लोहे का पाइप लगने से मौत हो गई थी। निगम की लापरवाही के कारण स्ट्रीट लाइट की तार सड़क पर पड़ी थी। टूटी तार बोलेरो के अगले टायर में उलझने से स्ट्रीट लाइट पर लगे इंसुलेटर के साथ और पाइप का टुकड़ा तेज गति बोलेरो के कंडक्टर साइड के बीच वाले शीशे को तोड़ते हुए एसडीओ के सिर के पिछले हिस्से में लगा। पुलिस ने नगर निगम के खिलाफ केस दर्ज किया था। इस मामले में करीब तीन साल क्लेम लेने में लग गए थे।

 

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